Pratinidhi Kahaniyan : Premchand

Rs. 75

भारतीय ग्रामीण जीवन और जनमानस की विभिन्न स्थितियों के अप्रतिम चितेरे मुंशी प्रेमचन्द विश्वविख्यात साहित्यकारों की पंक्ति में आते हैं। उनकी ये प्रतिनिधि कहानियाँ प्रायः पूरी दुनिया की पाठकीय चेतना का हिस्सा बन चुकी हैं। सुप्रसिद्ध प्रगतिशील कथाकार भीष्म साहनी द्वारा चयनित ये कहानियाँ भारतीय समाज और उसके स्वभाव के... Read More

Description

भारतीय ग्रामीण जीवन और जनमानस की विभिन्न स्थितियों के अप्रतिम चितेरे मुंशी प्रेमचन्द विश्वविख्यात साहित्यकारों की पंक्ति में आते हैं। उनकी ये प्रतिनिधि कहानियाँ प्रायः पूरी दुनिया की पाठकीय चेतना का हिस्सा बन चुकी हैं। सुप्रसिद्ध प्रगतिशील कथाकार भीष्म साहनी द्वारा चयनित ये कहानियाँ भारतीय समाज और उसके स्वभाव के जिन विभिन्न मसलों को उठाती हैं, ‘आज़ादी’ के बावजूद वे आज और भी विकराल हो उठे हैं, और जैसा कि भीष्म जी ने संकलन की भूमिका में कहा है कि प्रेमचन्द की मृत्यु के पचास साल बाद आज उनका साहित्य हमारे लिए एक चेतावनी के रूप में उपस्थित है। जिन विषमताओं से प्रेमचन्द अपने साहित्य में जूझते रहे, उनमें से केवल ब्रिटिश शासन हमारे बीच मौजूद नहीं है, शेष सब तो किसी-न-किसी रूप में वैसी-की-वैसी मौजूद हैं! वस्तुतः प्रेमचन्द ने हमारे साहित्य में जिस नए युग का सूत्रपात किया था, साहित्य को वे जिस तरह जीवन के निकट अथवा जीवन को साहित्य के केन्द्र में ले आए थे, वह हमारे लिए आज भी प्रासंगिक है। Bhartiy gramin jivan aur janmanas ki vibhinn sthitiyon ke aprtim chitere munshi premchand vishvvikhyat sahitykaron ki pankti mein aate hain. Unki ye pratinidhi kahaniyan prayः puri duniya ki pathkiy chetna ka hissa ban chuki hain. Suprsiddh pragatishil kathakar bhishm sahni dvara chaynit ye kahaniyan bhartiy samaj aur uske svbhav ke jin vibhinn maslon ko uthati hain, ‘azadi’ ke bavjud ve aaj aur bhi vikral ho uthe hain, aur jaisa ki bhishm ji ne sanklan ki bhumika mein kaha hai ki premchand ki mrityu ke pachas saal baad aaj unka sahitya hamare liye ek chetavni ke rup mein upasthit hai. Jin vishamtaon se premchand apne sahitya mein jujhte rahe, unmen se keval british shasan hamare bich maujud nahin hai, shesh sab to kisi-na-kisi rup mein vaisi-ki-vaisi maujud hain! vastutः premchand ne hamare sahitya mein jis ne yug ka sutrpat kiya tha, sahitya ko ve jis tarah jivan ke nikat athva jivan ko sahitya ke kendr mein le aae the, vah hamare liye aaj bhi prasangik hai.